Tuesday, August 3, 2021

देश की GDP तेजी से पटरी पर लौट रही है लेकिन रोजगार के हालात बद से बदतर क्यों?

न्यूज डेस्क। देश के युवा अपना सारा काम छोड़कर ट्वीटर पर #मोदी_रोजगार_दो हैशटैग ट्रेंड करा रहे हैं. इस ट्रेंड पर अब तक 25 लाख से ज्यादा ट्वीट हो चुके हैं. इस हैशटैग को स्टूडेंट्स इसलिए ट्रेंड करा रहे हैं, क्योंकि वे SSC की भर्ती प्रक्रिया से नाराज हैं. देश के कई राज्यों में SSC और अन्य सरकारी नौकरी की भर्ती प्रक्रिया को लेकर प्रदर्शन भी हुए हैं. यह सभी घटनाएं देश में बेरोजगारी की समस्या की तरफ इशारा करती हैं.

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सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (CMIE) की रिपोर्ट के मुताबिक 2019-20 में भारत में करीब 40.35 करोड़ लोगों के पास नौकरी थी और देश में करीब 3.5 करोड़ बेरोजगारी से जूझ रहे थे. हम आपको बता दें, कि भारत में हर साल 1 करोड़ लोग बढ़ जाते हैं, जो नौकरी की तलाश में होते है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सत्ता में आने से पहले देश के युवाओं को हर साल 1 करोड़ नौकरी देने का वादा किया था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. जिसकी वजह से साल 2016-17 से ही नौकरी करने वालों की संख्या बढ़ी ही नहीं बल्कि धीरे-धीरे कम होती गई. अगर इन आंकड़ो को देश की अर्थव्यवस्था के साथ जोड़कर देखा जाए तो पता चलेगा अर्थव्यवस्था भले ही पटरी पर लौट आई हो, लेकिन रोजगार धीरे-धीरे अपनी पटरी से उतर रही है.

CMIE ने बेरोजगारी के जो आंकड़े जुटाए हैं, उसके मुताबिक भारत में नौकरी करने वाले लोगों की संख्या में भारी कमी आई है. 2016-17 भारत में करीब 40.73 करोड़ लोगों के पास नौकरी थी. 2017-18 में यह आंकड़ा 40.59 करोड़ हो गया. वहीं, 2018-19 में यह आंकड़ा गिरकर 40.09 करोड़ के पास चला गया.

कोरोना महामारी के कारण लॉकडाउन के चलते यह आंकड़े बद से बदतर हो गए, क्योंकि पिछले साल भारत में करोड़ों लोगों की जॉब चली गई थी. इस वजह से 2019-20 के अंत तक देश में 3.5 करोड़ लोग बेरोजगार थे. इतनी ही नहीं पिछले महीने नौकरियां जाने से यह आंकड़ा 4 करोड़ से 4.5 करोड़ हो गया था. इनमें से कई लोग ऐसे हैं, जिनके ऊपर परिवार की जिम्मेदारी है. ऐसे में स्थिति और भयावह हो जाती है.

इसमें 4.5 करोड़ लोगों का खुले तौर पर बेरोजगारी का आंकड़ा है. यानी ऐसे बेरोजगार लोग जो नौकरी करना चाहते हैं. उनके पास स्किल्स भी है. फिर भी उनको काम नहीं मिल रहा है. इसके अलावा देश में दूसरी टाइप की बेरोजगारी भी है. ऐसे में बेरोजगारी की समस्या उससे कई गुना बड़ी है, जितना हम समझ रहे हैं.

आम तौर पर विशेषज्ञ मानते हैं, कि GDP ग्रोथ रेट वापस पटरी पर लौटने से बेरोजगारी की समस्या अपने आप खत्म हो जाएगी. जोकि सही भी है. लेकिन भारत के मामले में ऐसा नहीं हो रहा है. इंडियन एक्सप्रेस में अर्थव्यवस्था पर लिखने वाले पत्रकार उदित मिसरा का कहना है कि मोदी सरकार ने रोजगार को जितना संगठित करने की कोशिश की है, शायद ही किसी सरकार ने किया होगा.

सरकार के इस कदम की तारीफ करनी चाहिए. लेकिन रोजगार के मामले में आखिर नुकसान ही हुआ क्योंकि बिजनेस में ज्यादा लोगों को रखने के बजाय ज्यादा मशीनों को रखने पर जोर दिया गया. जिसने लोगों के रोजगार को प्रभावित किया.

देश में सिर्फ 40 फीसदी लोग नौकरी की तलाश करते हैं

भारत में रोजगार को लेकर और भी समस्याएं हैं. हमेशा कहा जाता है, भारत सबसे ज्यादा युवा आबादी वाला देश है. ऐसा बोलकर हम भारी संख्या में ह्यूमन रिसोर्स का दावा करते हैं. लेकिन भारत में 19-59 साल में प्रवेश करने वाले लोगों में से सिर्फ 40 प्रतिशत लोग ही रोजगार की तलाश करते हैं. इस रोजगार तलाश करने वाली दर को लेबर फोर्स पार्टिशिपेशन रेट (LFPR) कहा जाता है.

भारत में LFPR 40 प्रतिशत है वहीं विकसित देशों में करीब 60 प्रतिशत है. भारत में इसकी संख्या में कमी होने का कारण महिलाओं का नौकरी न करना और कई मामलों में नौकरी न मिलने से हताश होकर रोजगार की तलाश करना छोड़ देना.

सरकार को मूल समस्या को निवारण करना होगा

जब उदित से सवाल पूछा गया कि बेरोजगारी की समस्या को हल करने के लिए क्या सरकार को मनरेगा जैसे शहरी रोजगार गारंटी योजना को चलाना चाहिए. तो उन्होंने कहा, मनरेगा सिर्फ रोजगार नहीं देता है, यह बेरोजगारी की जानकारी भी देता है. यह देश में कितना अकुशल वर्कफोर्स है उसे दर्शाता है. सरकार को बेरोजगारी की समस्या को हल करने के लिए मनरेगा जैसी सब्सिडी योजनाओं से हटकर सोचना होगा. उन्हें मूलभूत सुधारों पर ध्यान देना होगा.

सरकार को शिक्षा और स्किल पर खर्च बढ़ाना होगा. ऐसा करने से नौकरियों में लोग सीधे स्किल्ड वर्कफोर्स के रुप में जुड़ेंगे. मनरेगा पर सरकार बहुत खर्चा करती है. सब्सिडी पर इतना ज्यादा खर्च करने बजाए अगर स्किल सिखाने वाली शिक्षा पर किया जाता तो रोजगार की समस्या को हमेशा के लिए खत्म किया जा सकता है.

नेशनल स्किल डेवेलपमेंट कॉर्पोरेशन (NSDC) ने 2020 में एक सर्वे किया. इस विश्लेषण के मुताबिक 2023 तक 6 करोड़ भारतीय लेबर फोर्स में शामिल होने वाले हैं. इसके अलावा जो पहले से स्किल्ड हैं. उन्हें दोबारा से स्किल्ड बनाने की जरूरत पड़ेगी. हालांकि, देश में ऐसी कोई विशेष योजना नहीं है. इसके अलावा 2014 के बाद से शिक्षा पर होने वाले खर्च में गिरावट आई है.

रोजगार के आंकड़ों में पारदर्शिता नहीं है

सरकार का दावा है कि स्किल इंडिया प्रोग्रम वेबसाइट पर ट्रेनिंग पाने वाले लोगों में से 54% का प्लेसमेंट हुआ है, लेकिन कौशल विकास मंत्रालाय की वेबसाइट पर उपलब्ध 2019-20 की रिपोर्ट के अनुसार 31 दिसंबर, 2019 तक PMKVY में सर्टिफिकेट पाने वाले लोगों की संख्या 3,81,131 थी. जिसमें से 1,09,729 लोगों का प्लेसमेंट हुआ है. मतलब करीब 29% का.

इस मामले में हमारे सामने सबसे बड़ी समस्या आंकड़ों की है. सरकार की तरफ से दिए जाने वाले आंकड़े डेटा पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे के होते हैं. अगर हमारे पास सही आंकड़े होते, तो इससे सिर्फ पारदर्शिता ही नहीं आती बल्कि सरकार और नीति निर्माताओं को रोजगार या अर्थव्यवस्था से जुड़ी योजनाओं को बनाने में आसानी होती.

इसके लिए हम आपको अमेरिका का उदाहरण देते हैं. अमेरिका में सरकार के पास अलग-अलग सेक्टर के लेटेस्ट आंकड़े होते हैं. इसके आधार पर सरकार फैसला करती है कि किस सेक्टर में लोगों को नौकरी देनी है और किसमें देने से रोकना है. भारत भी ऐसे फैसले ले सकता है. लेकिन सही से आंकड़े ना होने के कारण बेरोजगारी की तस्वीर साफ नहीं है और यह समस्या समय के साथ गंभीर होती जा रही है.

यह भी पढ़ें- युवाओं का दर्द: सरकारें नौकरियों पर कुंडली मारकर क्यों बैठी हैं?

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