Wednesday, August 4, 2021

जम्मू-कश्मीर में रोहिंग्याओं पर सरकार ने कसा शिकंजा, शरणार्थी बोले- हम भारत में रहना चाहते हैं

न्यूज डेस्क। जम्मू-कश्मीर में करीब दो दशकों से म्यांमार से आए हजारों रोहिंग्या अवैध रूप से रहे हैं. अब केंद्र सरकार ने इन पर कार्रवाई शुरु कर दी है. इन लोगों को जम्मू से निकालकर कठुआ के हीरानगर में बने डिटेंशन सेंटर में भेजा जा रहा है. प्रशासन ने अब तक 175 से ज्यादा रोहिंग्याओं को गिरफ्तार कर डिटेंशन सेंटर में डाला है.

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इस दौरान सरकार की कार्रवाई को रोकने के लिए गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में याचिका डाली गई और डिटेंशन सेंटर में डाले गए रोहिंग्याओं को रिलीज करने की मांग की गई. यह याचिका दो रोहिंग्याओं मोहम्मद शकीर और मोहम्मद सलीमुल्लाह ने डाली है.

म्यांमार में सैन्य हिंसा के बाद रोहिंग्या भारत आए

दरअसल, 2016 में म्यांमार में सैन्य हिंसा हुई. इस हिंसा के दौरान करीब 10 लाख से ज्यादा रोहिंग्याओं को देश छोड़ना पड़ा था. इनमें से अधिकतर रोहिंग्या बांग्लादेश चले गए. साथ ही हजारों की संख्या में रोहिंग्या भारत और मलेशिया में बस गए. भारत में लगभग 40 हजार रोहिंग्या आए हैं. इनमें से 10 हजार से ज्यादा जम्मू-कश्मीर में बस गए.

म्यांमार में सैन्य हिंसा के दौरान रोहिंग्याओं के गांव में आग लगा दी गई थी. जिसमें हजारों की संख्या में रोहिंग्या मारे गए थे. इसके अलावा महिलाओं के साथ बलात्कार भी किया गया था. इसे लेकर United Nation की कई एजेंसियों ने म्यांमार की आर्मी को जिम्मेदार ठहराया था.

हम भारत छोड़कर नहीं जाना चाहते: रोहिंग्या मुस्लिम

मोहम्मद सलीम, जिनकी उम्र 42 साल है. वह 10 साल पहले अपने परिवार के साथ म्यांमार छोड़कर भारत आए थे और जम्मू-कश्मीर में बस गए थे. अब उन्हें फिर से बेघर होने का डर सता रहा है. सलीम का कहना है कि म्यांमार में स्थिति ठीक नहीं है. हम भारत में रहना चाहते हैं, जब तक वहां पर सब कुछ ठीक नहीं हो जाता है. हमें जबरदस्ती भेजा जा रहा है. जम्मू-कश्मीर में सलीम की तरह अन्य रोहिंग्याओं का भी यही कहना है कि जब तक म्यांमार के हालात ठीक नहीं होते हैं. वह भारत में ही रहना चाहते हैं.

रोहिंग्याओं के पास डॉक्यूमेंट के नाम पर UNHCR कार्ड है

पुलिस के सूत्रों के मुताबिक, 5 मार्च को एक नोटिफिकेशन जारी की गई. इसमें कहा गया था कि जिन लोगों के पास लीगल ट्रेवल डॉक्यूमेंट नहीं हैं, उन्हें डिटेंशन सेंटर भेजा जा रहा है. वहां पर इनका नेशनल वेरिफिकेशन होगा. इसके बाद जो रोहिंग्या अवैध रूप से रह रहे हैं उनको वापस भेज दिया जाएगा. इससे पहले 2017 में सरकार ने रोहिंग्याओं की पहचान करने और उन्हें वापस भेजने की कार्रवाई करने की घोषणा की थी.

United Nation के मुताबिक रोहिंग्या शरणार्थी हैं. लेकिन भारत इस बात को नहीं मानता है. रोहिंग्याओं के पास दस्तावेज के नाम पर UNHCR (United Nations High Commissioner for Refugees) कार्ड है. रोहिंग्या इस कार्ड को दिखा रहे हैं. उन्हे लगता है कि ऐसा करने से वह सरकार की कार्रवाई से बच जाएंगे. लेकिन इसे लेकर पुलिस का कहना है कि UNHCR कार्ड जम्मू-कश्मीर में बसने के लिए लीगल डॉक्यूमेंट नहीं है.

म्यांमार सभी रोहिंग्याओं वापस लेगा यह साफ नहीं

पिछले कुछ सालों में म्यांमार ने कुछ रोहिंग्या मुसलमानों को वापस लिया. लेकिन बड़ी तादाद में उनको वापस लेगा यह अभी क्लियर नहीं है. वहीं, बांग्लदेश ने भी अपने कुछ लोगों को वापस लिया है, लेकिन रोहिंग्याओं को वापस लेने पर संशय बना हुआ है. इस संबंध में असम के वरिष्ठ पत्रकार राजीव भट्टाचार्य का कहना है कि रोहिंग्याओं को वापस भेजने की प्रक्रिया काफी लंबे समय तक चलेगी.

सबसे पहले इन शरणार्थियों की जानकारी जुटाई जाएगी. इसके बाद उनका देश वेरिफाई करेगा. इस प्रक्रिया में महीनों लग सकते हैं. उनके अनुसार नॉर्थ-ईस्ट में कोई डिटेंशन सेंटर भी नहीं बनाया गया है. वहां पर बहुत ही कम रोहिंग्याओं को पकड़ा गया है और कुछ को ही वापस म्यांमार भेजा गया है. अभी कुछ को भेजना बाकी है.

चुनाव के समय रोहिंग्याओं का मामला गरमाया

रोहिंग्याओं को वापस भेजने प्रक्रिया उस समय हो रही है. जब केरल, असम, पश्चिम बंगाल समेत देश के पांच राज्यों में चुनाव होने वाले हैं. इन चुनावों में CAA एक अहम मुद्दा रहने वाला है. साथ ही इन राज्यों में अच्छी-खासी मुस्लिम आबादी भी है. 2019 दिसंबर में केंद्र सरकार CAA लेकर आई थी. जिसके तहत मुस्लिमों को छोड़कर पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से धार्मिक रूप से प्रताड़ित किए गए अल्पसंख्यकों को नागरिकता दी जाएगी. जिसे लेकर देश के कई राज्यों में विरोध प्रदर्शन हुए.

बता दें, जम्मू-कश्मीर में रोहिंग्याओं को वापस भेजने प्रक्रिया चालू हो गई है. लेकिन इसे लेकर कुछ सवाल भी खड़े हो रहे हैं. जैसे, क्या रोहिंग्याओं को वापस भेजने की प्रक्रिया कब तक चलेगी? क्या भारत ने उन्हें वापस लेने के लिए उनके देशों से बात की है? या फिर कब तक रोहिंग्याओं को डिटेंशन सेंटर में रखा जाएगा? इन सवालों के जबाव अभी तक सरकार ने क्लियर नहीं किए हैं.

यह भी पढ़ें- JNU छात्रसंघ की अध्यक्ष आइशी घोष बंगाल विधानसभा चुनाव लड़ने जा रही हैं

 

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