Saturday, October 16, 2021

CDPHR का दावा भारत के पड़ोसी देशों में अल्पसंख्यकों का हाल बेहाल है

नई दिल्ली। CENTER FOR DEMOCRACY PLURALISM AND HUMAN RIGHTS शार्ट में कहा जाए CDPHR ने नई दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में एक रिपोर्ट जारी की. संस्था की इस रिपोर्ट में भारत के 7 पड़ोसी देशों में अल्पसंख्यकों की स्थिति और मानवाधिकार को लेकर एक रिसर्च तैयार की गई है. इन सात देशों में पाकिस्तान, अफगानिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश, तिब्बत, मलेशिया और इंडोनेशिया शामिल हैं.

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यह रिपोर्ट वकील, जज, पत्रकारों, शोधकर्ताओं और शिक्षाविदों की टीम के द्वारा तैयार की गई है. रिपोर्ट का आधार गरिमा, न्याय, नागरिक समानता और लोकतंत्र की स्थिति है. इसमें भारत के पड़ोसी देशों में अल्पसंख्यकों की स्थिति क्या है? उसके बारे में बताया गया है.

इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत के पड़ोसी देशों में अल्पसंख्यक समाज की राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक हालत खराब है. इन देशों में अल्पसंख्यक महिलाओं के साथ रेप और मर्डर जैसी घटनाएं रोज सामने आती हैं. चलिए विस्तार में जानते हैं इन देशों में अल्पसंख्यकों का क्या हाल है.

बांग्लादेश

1971 में जब बांग्लादेश भारत का पड़ोसी बना तो वह एक सेक्युलर देश था. लेकिन 1975 में वहां की सरकार ने संविधान से सेक्युलर वर्ड निकालकर कुरान की कुछ आयतों को शामिल कर दिया. जिसके बाद यह एक इस्लामिक देश बन गया.

यहां के इस्लामिक कंट्टरपंथी रोजाना धार्मिक आधार पर अल्पसंख्यकों पर आत्याचार करते हैं. ढाका विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अबुल बरकत की रिपोर्ट के अनुसार बीते 4 दशकों में 2,40,612 लोगों ने बांग्लादेश से पलायन किया है. रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अगर ऐसे ही पलायन होता रहा तो अगले 30 साल यहां पर एक भी हिंदू नहीं बचेंगे. बता दें, पीएम मोदी के ढाका दौरे के बाद वहां पर हिफाजत-ए-इस्लाम ने मंदिरों पर हमला किया था.

1971 में जब बांग्लादेश का गठन हो रहा था तो उस समय बहुत बड़े पैमाने पर नरसंहार हुआ था. ऑफिशियल रिपोर्ट के अनुसार, उसे मानवीय इतिहास का सबसे डरावना समय कहा गया. इस नरसंहार में करीब 30 लाख लोगों की हत्या की गई और 2 लाख महिलाओं के साथ रेप किया गया था. जिसपर पाकिस्तान ने कभी खुलकर बात नहीं की.

1972 में जस्टिस हुमुदूर रहमान के नेतृत्व में एक फैक्ट फाइडिंग कमेटी बनाई गई थी. जिसकी एक कॉपी पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो को सौंपी गई थी. जिसे पाकिस्तान ने तुंरत नष्ट कर दी थी. इस भयानक नरसंहार के बाद बांग्लादेश में सेक्यूलरिज्म का जन्म हुआ. लेकिन कट्टरपंथियों के राजनीति में आने से 1977 में संविधान से सेक्युलर वर्ड निकाल दिया और इस्लाम को डाल दिया. जिसके बाद 1988 में इस्लाम बांग्लादेश का प्रमुख धर्म बन गया.

यहां पर आर्थिक क्षेत्रों में भी अल्पसंख्यकों को कोई सुविधा नहीं है. देश में 11 बैंक हैं लेकिन उनमें 100 फीसदी शरिया हैं. पूरे देश में चिटगोंग हिल ट्रैक्ट एकमात्र ऐसा एरिया है, जहां पर 1951 में 90% बुद्धिस्ट आबादी थी. हिंदू अल्पसंख्यक काफी लंबे समय से पीड़ित रहे हैं. यहां सबसे ज्यादा बंगालियों की संख्या है. चिटगोंग में भी करीब 55% आबादी इस्लामिक है. एक स्टडी रिपोर्ट के मुताबिक 1951 में यहां पर 25 फीसदी आबादी हिंदुओं की थी, जो 2017 में 9 फीसदी हो गई.

रिपोर्ट के अनुसार 1951 में बांग्लादेश में मुस्लिमों की आबादी 76.85% थी, जो 2011 में 90.39% हो गई. वहीं, उस पीरीयड में हिंदू, सिख, बौद्ध और जैन धर्म के लोगों की आबादी 22.89% से घटकर 9.30% हो गई. CDPHR के अनुसार यह वही समय है जब इंटरनेशनल मानवाधिकार जैसी ऑर्गनाइजेशन को हस्तक्षेप करना चाहिए था.

CDPHR की रिपोर्ट में बताया गया है कि महिलाओं और बच्चों के उत्पीड़न को रोकने के लिए एक एक्ट बनाया गया था लेकिन उसे ठीक से लागू नहीं किया गया. UN के शांति स्थापना मिशन में बांग्लादेश की सबसे ज्यादा 6731 सैनिकों का योगदान है, ताकि दुनिया में शांति कायम की जा सके. लेकिन उसके अपने ही देश में अल्पसंख्यक सुरक्षित नहीं है.
यहां पर सबसे पहले 1946 में हिंदू विरोधी दंगा हुआ था. फिर इसके बाद 1971 में नरसंहार हुआ था. इस रिपोर्ट का दावा है कि वहां की आवामी लीग सरकार बैकडर से इस्लामिक कट्टरता फैला रही है.

पाकिस्तान

पाकिस्तान भले ही मुस्लिम राष्ट्र हो लेकिन वहां खुद मुसलमान सुरक्षित नहीं है. पाकिस्तान में शिया और अहमदिया मुसलमान कुरान नहीं पढ़ सकते हैं. यहां पर सुन्नी आबादी ज्यादा है. पाक में हिंदू, सिख और ईसाई अल्पसंख्यकों का हाल बहुत बुरा है. हर रोज अल्पसंख्यक महिलाओं के साथ बलात्कार, अपहरण और मारपीट जैसी घटनाएं होती हैं. अल्पसंख्यकों को डरा-धमकाकर उनका धर्म परिवर्तन किया जाता है.

रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान में हिंदुओं ऊपर एट्रोसिटी एक्ट लगाया जा रहा है और उन्हें जेल में बंद कर दिया जा रहा है. पाकिस्तान के हालात आज भी 1950 के जैसे हैं. आजादी के समय पाकिस्तान में हिंदुओं के सबसे नेता जोगेंद्रनाथ मंडल ने हिंदुओं के ऊपर लगाए जा रहे एट्रोसिटी एक्ट के बारे में पाक सरकार को बताया था.

उन्होंने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को बताया था कि पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान में हिंदुओं पर अत्याचार दिन पर दिन बढ़ रहा है. 10 फरवरी 1950 को ढाका में 10 हजार हिंदुओं का नरसंहार किया गया था. मंडल के एक पत्र ने इस बात का खुलासा किया था कि पाकिस्तान के सिंध और कराची में दलित हिंदुओं के हालात बेहद खराब हैं. पाकिस्तान में सुन्नी मुसलमानों ने 363 मंदिरों और गुरद्वारों को कत्लखाना में बदल दिया था.

CDPHR की रिपोर्ट के मुताबिक 1941 में पाकिस्तान में हिंदुओं और सिखों की आबादी 19.6% थी. जो साल 1991 आते-आते 1.65% हो गई. वहीं, 1998 में यह आंकड़ा 1.6 प्रतिशत और गिर गया. पाकिस्तान में 2017 की जनगणना रिपोर्ट में धार्मिक आंकड़ों को सार्वजनिक नहीं किया गया था.

इस रिपोर्ट के अनुसार इंडियन एक्सप्रेस की पत्रकार दिव्या गोयल ने पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों की आबादी का एक अनुमानित आंकड़ा बताया. उनके मुताबिक पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की आबादी 0.19% और गिरी है. उस हिसाब से 2017 में अल्पसंख्यकों की आबादी 1.41% होनी चाहिए.

अफगानिस्तान

भारत के पड़ोसी देश अफगानिस्तान में मानवाधिकार की स्थिति बेहद जर्जर है. यहां अल्पसंख्यकों के साथ दो तरह का व्यवहार होता है. इस बात की गवाही यह है कि 1970 जनगणना रिपोर्ट के मुताबिक अफगानिस्तान में हिंदू और सिखों की संख्या करबी 7 लाख थी. लेकिन अब वहां हिंदू और सिख परिवारों की संख्या सिर्फ 200 रह गई है. इतना ही नहीं यहां के संविधान में लिखा है कि देश में केवल मुस्लिम व्यक्ति ही देश का राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री बन सकता है. अधिकारियों को केवल इस्लामिक सिद्धांत मानने होंगे.

CDPHR संस्था की निदेशक डॉ. प्रेरणा मल्होत्रा के अनुसार अफगानिस्तान में सामाजिक और राजनीतिक कट्टरता काफी ज्यादा है. वहां के संविधान ने देश में सिर्फ मुस्लिमों को जगह दी है. अफगानिस्तान में गैर-मुस्लिमों के साथ ऐसा व्यवहार किया जाता है जैसे कि वे देश के नागिरक ही न हों.

तिब्बत

तिब्बत के बारे में पूरी दुनिया जानती है कि कैसे चीन तिब्बतवासियों के मानवाधिकारों को रौंद रहा है. वह तिब्बत में बौद्धों की सामाजिक, आर्थिक, भाषाई और सांस्कृतिक पहचान को खत्म करने में तुला है. लेकिन चीन ने इसे कभी नहीं स्वीकारा है. 1951 में चीन ने चांबो के युद्ध में तिब्बत पर कब्जा कर लिया था.

1959 में तिब्बत के लोगों ने चीन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया था. जिसके बाद चीन ने तिब्बत में कल्तेआम शुरु किया. जिसमें हजारों लोगों की हत्या कर दी गई. इसके बाद दलाई लामा 80 हजार तिब्बतियों के साथ भारत चले आए. केंद्रीय योजना आयोग की 2009 की रिपोर्ट मुताबिक, भारत में 94,203 तिब्बती निवास करते हैं.

यह भी पढ़ें- अमेरिकी रिसर्च सेंटर के अनुसार 2050 तक मुस्लिम आबादी हिंदुओं की दोगुनी होगी

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