Saturday, October 16, 2021

गरीबी के कारण स्कूल छोड़ना पड़ा, फिर नौकरी छूट गई, आज फार्मिंग से कमा रहे लाखों रुपए

मंजिल तक अगर पहुंचना है तो कभी राह के काँटों से मत घबराना…..ऐसे ही महाराष्ट्र के रहने वाले एक शख्स हैं, जो  राह में आने वाले कांटों से कभी नहीं घबराए और मंजिल को हासिल करने के लिए निरंतर चलते रहे। इस शख्स का नाम ज्ञानेश्वर बोडके है।

- Advertisement -

ज्ञानेश्वर पुणे जिले के मुल्सी तालुके में रहते हैं। इनका बचपन काफी तंगहाली में गुजरा है। परिवार काफी बड़ा था, लेकिन घर की आय बेहद कम थी। उनके पास थोड़ी बहुत जमीन थी, जिससे जैसे-तैसे करके गुजारा चलता था। सभी की तरह ज्ञानेश्वर भी पढ़-लिखकर कुछ अच्छा करना चाहते थे, लेकिन उनके घर में कमाने वाला कोई नहीं था। जिसकी वजह से उन्हें 10वीं के बाद पढ़ाई छोड़नी पड़ी। इसके बाद उनके किसी परिचित ने पुणे में उन्हें ऑफिस बॉय की नौकरी दिलाई।

ज्ञानेश्वर को नौकरी मिल गई और घर का खर्चा चलने लगा, लेकिन हमेशा उनको ऐसा लगता था कि वह जितनी मेहनत कर रहे हैं, उनको उतना नहीं मिल रहा है। 10 साल के बाद ज्ञानेश्वर ने नौकरी छोड़ दी और गांव वापस चले आए। वापस आकर उन्होंने बैंक से लोन लिया और फूलों की बगानी चालू की। आज के समय उनकी कमाई लाखों में है और वे सैकड़ों किसानों को रोजगार दे रहे हैं।

परिजनों ने किया विरोध, पर अपने लक्ष्य से नहीं भटके 

ज्ञानेश्वर सुबह 6 बजे से लेकर 11 बजे तक ऑफिस का काम करते थे। इस बीच कुछ नया करने के बारे में भी सोचते थे। एक दिन उन्हें अखबार में एक किसान के बारे में खबर मिली, जो पॉलीहाउस विधि से खेती करता था और सालाना 12 लाख रुपए कमाता था। उसकी कहानी पढ़कर उन्हें लगा कि जब वो किसान इतना कमा सकता है तो वह क्यों नहीं। फिर क्या था, इसके बाद उन्होंने 1999 में अपनी जॉब छोड़ दी।

जब वह गांव लौटे तो घर के लोगों ने उनका विरोध किया। उनके परिजन का कहना था कि जो कुछ कमाई का जरिया था वह भी बंद हो गया। अगर खेती में मुनाफा होता तो लोग बाहर कमाने क्यों जाते? विरोध होने के बावजूद ज्ञानेश्वर अपने मार्ग पर अटल रहे और खेती के बारे में जानकारी जुटाने लगे। नई तकनीक से खेती करने वाले किसानों के पास वे जाने लगे। इसी दौरान उनको पता चला कि पुणे में बागवानी और पॉलीहाउस को लेकर वर्कशॉप आयोजित किया गया है।

ज्ञानेश्वर उस वर्कशॉप पर पहुंच गए। वर्कशॉप में दो दिनों तक उनको थ्योरी बताई गई, लेकिन प्रैक्टिकल का कोई ज्ञान नहीं दिया गया। वह ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे। जो कुछ भी उनको वहां पर बताया गया वो सब उनके सर के ऊपर से निकल गया।

हौसला नहीं खोया

उन्होंने नौकरी छोड़ दी थी और नई खेती के बारे में ठीक से कुछ समझ नहीं पा रहे थे, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने सोचा कि जो लोग इस फील्ड में काम कर रहे हैं, क्यों न उनके साथ रहकर काम को सीखा जाए। इसके बाद वह पॉलीहाउस जाने लगे। वह साइकिल से 17 किमी का सफर कर वहां जाते थे। इसका उन्हें फायदा मिलने लगा और जल्द ही नई तकनीक के बारे में काफी हद तक जानकारी मिल गई।

फूलों की खेती से की शुरूआत 

ज्ञानेश्वर ने खेती करने के लिए बैंक में लोन के लिए अप्लाई किया। इसके लिए उन्हें थोड़ी बहुत भाग-दौड़ करनी पड़ी, लेकिन अंत में लोन मिल गया। इसके बाद उन्होंने एक पॉलीहाउस तैयार किया। फिर गुलनार और सजावटी फूलों की खेती शुरू की।

कुछ महीनों के बाद फूल तैयार हो गए तो पहले उन्हें लोकल मंडी में बेचना शुरू किया। जब लोगों का रिस्पॉन्स अच्छा मिलने लगा तो होटल वालों को संपर्क किया। फिर इसके बाद ज्ञानेश्वर ने पुणे के बाहर अपने प्रोडक्ट को बेचना चालू कर दिया। एक साल के अंदर उन्होंने बैंक का 10 लाख रुपए का लोन चुका दिया। जिसको लेकर बैंक मैनेजर ने ज्ञानेश्वर की तारीफ की थी।

integrated farming

इंटीग्रेटेड फार्मिंग की शुरूआत की

कुछ साल बाद फूलों की खेती में कमाई घटने लगी, क्योंकि देश के ज्यादातर लोगों ने नर्सरी खोल ली थी। अब ज्ञानेश्वर के सामने नई चुनौती आ गई कि अब क्या किया जाए। फिर उन्हें कहीं से पता चला कि इंटीग्रेटेड फार्मिंग काफी अच्छा कॉन्सेप्ट है। उन्होंने पॉलीहाउस में सब्जियों और फलों को उगाना शुरू कर दिया।

integrated farming

तीन-चार महीने में सब्जियां निकलने लगी और धीरे-धीरे फिर से उनका बिजनेस पटरी पर आने लगा। इस समय वह देसी केले, संतरे, आम, स्वीट लाइम और अन्य ऑफ सीजन सब्जियों को उगा रहे हैं। इसके अलावा उन्होंने दूध भी बेचना शुरू कर दिया। उनके पास पांच गाय हैं। वे पैकेट्स में दूध को भरकर लोगों के घर डिलीवरी करते हैं।

milk dairy

प्रोडक्ट को बेचने की चुनौती सामने आई

प्रोडक्शन होने के बाद ज्ञानेश्वर के सामने चुनौती आई कि इसे बेचा कैसे जाए। इस दौरान उनकी मुलाकात नाबार्ड के अधिकारियों से हुई। उन्होंने अधिकारियों से कहा कि जो प्रोडक्ट आप लोग मार्केट से लेते हैं, यदि उनको घर पर डिलीवर कर दिया जाए तो क्या आप उसे खरीदेंगे? अधिकारियों ने उनके प्रोडक्ट को खरीदने में दिलचस्पी दिखाई और उनसे कुछ सैंपल मांगे, जो उन्हें बेहद पसंद आए। इसके बाद से वे उनके परमानेंट ग्राहक बन गए।

farming

बिजनेस को बढ़ाने के लिए ऐप किया लॉन्च

हाल ही में ज्ञानेश्वर ने एक ऐप लॉन्च किया है। इस ऐप के जरिए लोग ऑर्डर करते हैं और वह उनके घर तक सामान पहुंचाते हैं। होम डिलीवरी के लिए उन्होंने स्पेशल बस और ऑटो रखी है, जिसके जरिए वह पुणे, मुंबई, गोवा, नागपुर, दिल्ली और कोलकाता अपने प्रोडक्ट को पहुंचाते हैं। ज्ञानेश्वर ने कुछ किसानों के साथ मिलकर अभिनव फार्मिंग क्लब नाम का एक ग्रुप बनाया है। अभी इस ग्रुप में तीन सौ से अधिक लोग जुड़े हैं। इस ग्रुप से जुड़े हर किसान की सालाना आय 10 लाख रुपए है।

fruits and veggies

क्या होती इंटीग्रेटेड फार्मिंग

एक समय में एक खेत में कई फसलों को उगाना इंटीग्रेटेड फार्मिंग कहलाता हैं। इसमें एक घटक को दूसरे घटक के साथ लाया जाता है। यानी अगर आप खेत में फल और सब्जियों को उगा रहे हैं तो आप गाय और भैंस भी पाल सकते हैं। इससे आपको चारे की कमी नहीं होगी। दूसरी तरफ इन मवेशियों के गोबर का प्रयोग ऑर्गेनिक खाद के रूप में किया जाता है।

ऐसे में लागत कम लगती है और कमाई ज्यादा होती है। इसके साथ बचत भी होती है।  ज्ञानेश्वर ने अपनी एक एकड़ जमीन को चार हिस्सों में बांट दिया है। एक हिस्से में फल, दूसरे में विदेशी सब्जियां, तीसरी में दालें और चौथे हिस्से में पत्तेदार सब्जियों को उगाते हैं।

यह भी पढ़ें- महिला पहले चरित्रहीन होती है फिर अपराधी, पर पुरुष हत्या के बाद सिर्फ खूंखार कातिल कहलाकर राहत पा लेता है

पॉलीहाउस को कैसे लगवाया जाए?

खेती में पॉलीहाउस ऐसी तकनीक है, जिसके जरिए खेतों में ऑफ सीजन की सब्जियों को आसानी से उगाया जा सकता है। इसका स्ट्रक्चर स्टील का होता है और प्लास्टिक से इसे ढाका जाता है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि बारिश, ओले या गर्मी का इस पर कोई असर नहीं होता है। इसके अलावा पानी की भी जरूरत कम पड़ती है।

जो लोग पॉलीहाउस लगवाना चाहते हैं, वे बैंक से लोन ले सकते हैं। इसके साथ राज्य सरकार 50 फीसदी सब्सिडी देती है। एक नॉर्मल पॉलीहाउस लगाने में 5 से 10 लाख का खर्च आता है। इसकी लाइफ कम से कम 10 साल होती है। जबकि इससे सालाना कमाई 3-4 लाख रुपए है। इस तकनीक की शुरूआत करने के लिए नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विश्वविद्यालय से संपर्क कर सकते हैं या फिर आप उस सफल किसान के पास जा सकते हैं जिसने पॉलीहाउस को लगाया हो और खेती कर रहा हो।

- Advertisement -

Related Articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Stay Connected

135FansLike

Latest Articles