Wednesday, August 4, 2021

अगर सरकार का काम बिजनेस करना नहीं है, तो क्या है? समझें विस्तार से

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को एक बयान दिया, उन्होंने कहा, बिजनेस करना सरकार का काम नहीं है और उनकी सरकार कुछ सरकारी संस्थानों को छोड़कर बाकी सबको प्राइवेट कर देगी. पीएम का कहना है कि सरकारी कंपनियों को सिर्फ इसीलिए नहीं चलाया जाना चाहिए क्योंकि वह विरासत में मिली हैं।

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पीएम मोदी ने खराब सार्वजनिक संस्थानों को वित्तीय समर्थन देना अर्थव्यवस्था पर बोझ कहा है. उन्होंने सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के लिए आयोजित वेबीनार में कहा कि बजट 2021-22 में भारत को ऊंचाईयों तक पहुंचाने के लिए एक स्पष्ट रूपरेखा बनाई गई है. कई सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थान घाटे में हैं, उनमें कइयों को करदाताओं के पैसे से मदद दी जा रही है.

पीएम मोदी ने कहा है कि सरकार का काम बिजनेस करना नहीं है बल्कि सरकार का ध्यान जन कल्याण पर होना चाहिए. सरकार के पास कई ऐसे सरकारी संस्थान हैं, जिसका इस्तेमाल पूरी तरह से नहीं हुआ है या बेकार पड़ी है, ऐसी 100 सरकारी संपत्तियों को बाजार में चढ़ाकर 2.5 लाख रुपए एकत्र किए जाएंगे. पीएम मोदी का कहना है कि सरकार monetize और modernize पर ध्यान दे रही है. प्राइवेटाइजेशन से दक्षता आती है, रोजगार मिलता है। प्राइवेटाइजेशन से सरकार के पास जो पैसा आएगा उसका इस्तेमाल जन कल्याण के लिए किया जाएगा.

यहां पर पीएम मोदी की बात सही है, लेकिन सरकारी संस्थानों से हर कोई जुड़ा है, जो सुविधाएं प्राइवेट सेक्टर में हमारी पहुंच से दूर हैं उन्हें हम सरकारी संस्थानों की तरफ से लेते हैं. ऐसे में तो सरकार के लिए तो सरकारी संस्थान भी चलाना जरूरी है, क्योंकि सरकार का तो कर्तव्य है कि वह लोगों की जरूरी आवश्यकताओं का ख्याल रखे. अब यहां सवाल यह उठता है कि आखिर सरकार का काम क्या है? अगर प्राइवेटाइजेशन आया तो हमारा फायदा और नुकसान क्या है? आइए इसे समझते हैं पूरे विस्तार से…..

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तो आखिर सरकार का क्या काम है?

सरकार का काम क्या है यह जानने से पहले आपको जानना होगा कि सरकार है क्या? तो सरकार, एक व्यवस्था है, जिसके अंतर्गत राज्य या समुदाय को नियंत्रित किया जाता है और सभी व्यवस्थाओं को सुचारू रूप से चलाया जाता है.

सरकार का काम कानून व्यवस्था को बनाए रखना, लोगों को उनकी मूलभूत आवश्यकताओं को मुहैया कराना ( शिक्षा, रोटी, कपड़ा और मकान), देश के विकास के लिए काम करना ( जैसे- अस्पताल, सड़क इत्यादि), देश की सुरक्षा करना और विदेश नीति को देखना.

अब हमने यह तो जान लिया है कि सरकार का क्या है? लेकिन अगर सरकार प्राइवेटाइजेशन करेगी तो इसका नफा और नुकसान क्या है? तो आइए जानते हैं….

प्राइवेटाइजेशन के फायदे

  • बिजनेस की दुनिया में कॉम्पिटिशन होना बहुत अच्छी बात है. इस कॉम्पिटिशन की वजह से मार्केट में नए-नए प्रोडक्ट्स और सर्विसेज आते हैं और साथ ही इनोवेशन को भी बढ़ावा मिलता है. अगर मार्केट से यह कॉम्पिटिशन खत्म हो गया, तो कंपनियां मनमाना पैसा वसूलेंगी और एक ही प्रोडक्ट और सर्विसेज को आप पर थोपेंगी. यही आजकल सरकारी कंपनियों में हो रहा है, क्योंकि वहां पर कॉम्पिटिशन ही नहीं है. इसलिए सरकार कंपनियों (सरकारी) का प्राइवेटाइजेशन कर रही है.
  • प्राइवेटाइजेशन से कंपनियां पॉलिटिकल इन्फ्लुएंस से इम्यून हो जाएंगी. यानी कंपनियों में राजनीति और राजनेताओं का हस्तक्षेप खत्म हो जाएगा. जैसे- कभी-कभी ऐसा होता है कि सरकार या राजनेता कंपनियों को अपने स्थानीय उत्पादकों की आपूर्ति को खरीदने के लिए वहां से लेने के लिए बाध्य करते हैं जहां से वह चाहते हैं. भले ही उन्हें उसे खरीदने के लिए बाहर की तुलना में दोगुना पैसा देना पड़े. ऐसे में करप्शन को बढ़ावा मिलता है.
  • प्राइवेटाइजेशन से सरकार लोगों पर लगने वाले टैक्स को कम कर सकती है और रोजगार के नए-नए अवसर भी पैदा होंगे.

अब प्राइवेटाइजेशन के नुकसान को जानिए

  • हर संस्थान में पारदर्शिता होना बेहद जरूरी है. जिस संस्थान या देश में पारदर्शिता नहीं होती है वहां पर करप्शन और घूसखोरी बहुत होती है. प्राइवेटाइजेशन से लाभ कमाने के चक्कर में पारदर्शिता में कमी आएगी और फिर घूसखोरी को बढ़ावा मिलेगा.
  • प्राइवेटाइजेशन से लोगों को कम दामों पर सुविधाएं मिलती है, लेकिन कभी-कभी इसके विपरीत हो जाता है. उन्हें कुछ सर्विसेज या प्रोडक्ट्स के लिए दोगुने दाम देने पड़ते हैं.
  • प्राइवेटाइजेशन में लचीलेपन की समस्या आती है. कभी-कभी सरकारें प्राइवेट सेक्टर से लम्बे चौड़े कॉन्ट्रैक्ट करती हैं और इन कॉन्ट्रैक्ट्स को पाने की होड़ में कंपिनयां अपने दामों को कम कर देती हैं और कंज्यूमर को खुश कर देती है, ताकि वह सरकार से कॉन्ट्रैक्ट को पा सके.
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