Tuesday, August 3, 2021

ऐसी क्या वजह रही जो त्रिवेंद्र सिंह रावत को अपनी कुर्सी से हाथ धोना पड़ा

न्यूज डेस्क। त्रिवेंद्र सिंह रावत ने अपने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है। इसकी घोषणा उन्होंने आज मंगलवार को प्रेस कॉन्फेंस में की. कॉन्फ्रेंस में जब उनसे इस्तीफे की वजह पूछी गई तो रावत ने कहा दिल्ली जाना पड़ेगा. उत्तराखंड में रावत लगभग चार साल से सीएम के पद पर थे. माना जा रहा है कि सीएम रावत को हटाए जाने की वजह राज्य के 4 जिलों चमेली, रुद्रप्रयाग, अल्मोड़ा और बागेश्वर को मिलाकर गैरसैंण बनाना है.

- Advertisement -

इसके अलावा उन्होंने कई ऐसे फैसले लिए थे, जिसकी वजह से बीजेपी हाई कमान को उन्हें हटाने का फैसला लेना पड़ा. त्रिवेंद्र सिंह रावत पर भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं है. फिर भी एक सर्वे के मुताबिक उन्हें सबसे अलोकप्रिय सीएम माना जाता है.

वह पांच वजह जिसकी वजह से त्रिवेंद्र सिंह रावत को कुर्सी छोड़नी पड़ी…..

गैरसैंण मंडल कुमाऊं के जिलों को शामिल करना

उत्तराखंड भाषाई और सांस्कृतिक तौर पर दो मंडलों बंटा हुआ है. पहला गढ़वाल और दूसरी कुमाऊं. दोनों ही मंडलों के हर क्षेत्र में दबदबा कायम करने की होड़ लगी रहती है. उत्तर प्रदेश में रहते हुए भी इन मंडलों में होड़ लगी रहती थी. अगर किसी एक मंडल को कुछ मिलता था, तो दूसरे मंडल को भी देना पड़ता था. इसलिए रावत ने गैरसैंण मंडल में कुमाऊं के दो जिले अल्मोड़ा और बागेश्वर को शामिल कर दिया. जिसके बाद कुमाऊं में सियासी भूचाल आ गया. इसे कुमाऊं के अस्तित्व और पहचान पर हमला कहा गया.

सरकार के इस फैसले के बाद पूरे कुमाऊं के बीजेपी नेताओं ने केंद्रीय नेतृत्व के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. अगले साल विधानसभा चुनाव होने से ठीक पहले रावत के इस फैसले को उन्होंने आत्मघाती घोषित कर दिया. केंद्रीय नेतृत्व ने इसे गंभीर माना और विधानसभा का सत्र बीच में ही खत्म कर दिया. इसके बाद रावत को केंद्रीय पर्यवेक्षक रमन सिंह और दुष्यंत गौतम के साथ बैठक करने के लिए देहरादून बुलवा लिया.

विधायकों के साथ करने के बाज रमन सिंह और दुष्यंत सिंह ने अपनी रिपोर्ट पेश की. जिसमें उन्होंने साफ कर दिया कि त्रिवेंद्र सिंह रावत  के नेतृत्व में चुनाव लड़ने से बीजेपी को नुकसान हो सकता है. इसलिए उन्हें बदलने की जरूरत है.

देवस्थानम् बोर्ड की स्थापना करना

जब त्रिवेंद्र सिंह रावत ने उत्तराखंड देवस्थानम् बोर्ड क स्थापना करके केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री धाम को सरकार के अधीन कर दिया. तो इससे ब्राहम्ण समाज काफी नाराज हो गया था. इतना ही नहीं बीजेपी के नेती सुब्रमण्यम स्वामी ने उत्तराखंड सरकार के इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी.

बता दें, उत्तराखंड सरकार यह केस जीत गई थी. लेकिन स्वामी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दी. जिसकी सुनवाई चल रही है. रावत के इस फैसले से बीजेपी आलाकमान खुश नहीं थे. इसके अलावा हरिद्वार से लेकर बद्रीनाथ तक के संत समाज इससे काफी नाराज हो गए थे. यह बात भी उनकी कुर्सी के लिए काल साबित हो गई.

गैरसैंण को राजधानी बनाना

त्रिवेंद्र सिंह रावत ने जल्दीबाजी में गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित कर दिया था. इसे लेकर रावत ने कहा था कि यह फैसला पर्वतीय जनभावनाओं को देखकर लिया गया है. अपने इस फैसले को सही साबित करने के लिए उन्होंने गैरसैंण में काफी काम किया. लेकिन जनता ने इसे पूरी तरह से नकार दिया. इसके बाद विधानसभा की बैठक बुलाई गई. लेकिन देहरादून में अफसरों के रहने की वजह से लोगों को इसका कोई फायदा नहीं मिला. यह फैसला सिर्फ एक दिखावा निकला.

विशेष समुदाय के लिए करते थे काम

उत्तराखंड के लोग रावत के व्यवहार से काफी नाराज थे. वह कम बोलते थे और एक विशेष समुदाय के लिए काम करते थे. इसकी वजह से लोगों के निशाने पर आ गए थे. उन पर करप्शन के कोई आरोप नहीं थे. लेकिन एक मामले में हाईकोर्ट ने CBI को जांच करने की जिम्मेदारी दी थी. जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने स्टे लगा दिया था. 10 मार्च को इसकी सुनवाई होनी है. बता दें, हाल ही में एक सर्वे हुआ था, जिसमें रावत को सबसे अलोकप्रिय सीएम कहा गया था.

यह भी पढ़ें- कभी ममता के थे खास, अब बीजेपी का दे रहे साथ, क्या मिथुन चक्रवर्ती साबित होंगे ‘दीदी’ का काल?rawat

 

- Advertisement -

Related Articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Stay Connected

135FansLike

Latest Articles