Wednesday, August 4, 2021

यूपी के इस जिले में अनोखी परंपरा, रंगों के बजाए जूतों से खेली जाती है होली

यूपी। आमतौर पर होली रंग और गुलाल से खेली जाती है. लेकिन उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में होली की एक अनोखी परंपरा चली आ रही है. यहां पर जूता मार होली मनाई जाती है. इसमें करीब आठ किमी लंबा लाट साहब जुलूस निकाला जाता है. होली के दिन किसी तरह का विवाद न हो इसलिए प्रशासन जुलूस निकलने वाले रास्ते में पड़ने वाली सभी मस्जिदों और मजारों को तिरपाल से ढक देती है. पिछले कई सालो से मस्जिदों ढकने का काम होता आ रहा है.

एक ही दिन दो जुलूस निकलते हैं

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लाट साहब के दो जुलूस निकलते हैं. मुख्य लाट साहब जुलूस करीब आठ किमी लम्बा होता है और इसे तय करने में करीब आठ घंटे लग जाते है. इस जुलूस में एक व्यक्ति को लाट साहब बनाकर भैसा गाड़ी पर बैठाया जाता है. फिर उसे झाड़ू और जूते मारते हुए पूरे शहर में घुमाया जाता है. इसके अलावा आम लोग भी उसे जूते फेंककर मरते हैं. इसी प्रकार छोटा लाट साहब जुलूस भी उसी दिन निकाला जाता है.

जुलूस के दौरान मस्जिदें ढक दी जाती हैं

जुलूस के दौरान सांप्रदायिक सौहार्द बना रहे, इसके लिए पुलिस और प्रशासन रास्ते में पड़ने वाले धार्मिक स्थलों खासकर मस्जिदों को तीरपाल से कवर कर दिया जाता है और पूरे रास्ते में भारी पुलिस बल की तैनाती की जाती है.

इस संबंध में शाहजहांपुर के नगर अधीक्षक संजय कुमार ने बताया कि जुलूस के दौरान रास्ते में पड़ने वाली सभी मस्जिदों और मजारों पर प्रशासन अपने खर्च पर ढकती है ताकि कोई असामाजिक तत्व रंग या कुछ और फेंककर माहौल न खराब कर सके. उन्होंने कहा कि अभी तक जुलूस की वजह से कोई तनाव नही हुआ है और न ही कोई अप्रिय घटना घटी है. लेकिन हर साल एहतियात के तौर पर ऐसा किया जाता. यह करीब आठ से दस साल से होता आ रहा है.

जुलूस के रास्ते में छह बड़ी मस्जिद और कई छोटी मस्जिदों के साथ मजारें भी पड़ती है. सौहार्द बनाए रखने के लिए दो दिन पहले प्रशासन और स्थानीय लोगों के बीच बैठक हुई. बरेली क्षेत्र के पुलिस महानिरीक्षक राजेश कुमार पांडेय ने बताया कि इस इलाके में प्रशासन की इस पहल का स्वागत मस्जिद के मौलवी और मुस्लिम समुदाय के लोग करते हैं. यहां तक कि ये लोग खुद मस्जिदों की सुरक्षा के लिए उन्हें ढकने के लिए कहते हैं.

उनके अनुसार,  शहर में कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए भारी संख्या में अर्धसैनिक बल, पीएसी और कई जिलों की पुलिस तैनात की जाती है. जो मस्जिदों और पूरे शहर की सुरक्षा करती है. इसके अलावा ड्रोन के जरिए जुलूस पर नजर रखी जाती है.

masjid
लाट साहब जुलूस के दौरान शाहजहांपुर में मस्जिदें ढक दी जाती हैं.

आखिर लाट साहब जुलूस में क्या होता है?

स्थानीय लोगों के मुताबिक इस जुलूस को नवाब साहब जुलूस कहा जाता था. लेकिन बाद में इसे लाट साहब जुलूस कहा जाने लगा. जुलूस निकालने की यह परंपरा करीब सौ साल से ज्यादा पुरानी है. इसमें एक व्यक्ति को भैंसा गाड़ी में बैठाया जाता है और उसकी सुरक्षा में लोगों को तैनात किया जाता है.

इसमें जूते मारने की परंपरा थी लेकिन लोगों ने ऐसा करना कम कर दिया है. यह जुलूस कूचा लाला मोहल्ले से निकलता है और मंदिर तक जाता है. फिर इसके बाद सराफा मार्केट से निकलकर कोतवाली पहुंचता है. कोतवाली में परंपरा के अनुसार कोतवाल लाट साहब को सैल्यूट मारते हैं. फिर जुलूस सदर बाजार से निकलकर विश्वनाथ मंदिर होते हुए कूचा लाला पर खत्म हो जाता है.

वहां के लोगों के मुताबिक लाट साहब की पहचान गुप्त रखी जाती है. जिसके लिए लोगों को पैसे दिए जाते हैं. यह राशि कम से कम 11 हजार होती है. लेकिन कभी-कभी यह दो लाख तक पहुंच जाती है. यह जरूरी नहीं है किसे लाट साहब बनाया जाएगा. लेकिन जिसे भी बनाया जाएगा, उसकी पहचान गुप्त रखी जाएगी. इसके अलावा यह भी जरूरी नहीं है कि लाट साहब स्थानीय निवासी हो. अक्सर बाहर के व्यक्ति को ही बनाया जाता है.

आयोजक होली के दो-तीन दिन पहले और उसके दो-तीन बाद तक चुने गए व्यक्ति के रहने और खाने का इंतजाम करते हैं. व्यक्ति की पहचान इसलिए छिपाई जाती है ताकि कोई उसका मजाक न उड़ाए. बता दें, यह जुलूस अंग्रेजों के प्रति आक्रोश जताने के लिए निकाला जाता था. इसमें एक व्यक्ति को अंग्रेज के रूप में लाट साहब बनाकर भैंसा गाड़ी पर बैठाया जाता था और उसे झाड़ू और जूतों से मारा जाता था.

जुलूस के दौरान कभी तनाव हुआ था?

बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक पुलिस इस बात से इंकार करती आई है कि जुलूस के दौरान सांप्रदायिक तनाव हुआ है. लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि इस तरह की स्थितियां बन चुकी हैं.

एक स्थानीय पत्रकार सुशील कुमार कहते हैं कि जुलूस में बहुत भीड़ होती है और इस दौरान काफी हुड़दंग भी होता है. कई बार ऐसी घटना घटी है कि लोगों ने मस्जिदों पर रंग डाला है और विवाद की स्थिति पैदा हो गई. कई बार जुलूस के भीड़ का फायदा उठाकर कुछ असामाजिक तत्वों ने मस्जिदों पर जूते भी फेंके हैं. इन्हीं घटनाओं की वजह जुलूस के रास्ते में पड़ने वाले मस्जिदों को ढका जाने लगा है.

उन्होंने बताया कि होली के दिन निकलने वाले इस जुलूस में लाट साहब को बग्घी में बैठाया जाता है और उन्हें हेलमेट पहना दिया जाता है. लाट साहब पर फेंकने के लिए लोग सालभर अपने घरों में फटे-पुराने जूते इकट्ठा करते है.

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