Saturday, October 16, 2021

युवाओं का दर्द: सरकारें नौकरियों पर कुंडली मारकर क्यों बैठी हैं?

न्यूज़ डेस्क। एक कथन है, अगर उसका पोस्टर बनाया जाए तो उसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम जरूर आएगा. अब वो कथन क्या है, पहले देख लीजिए फिर आगे की बात करते हैं….उस कथन की पंक्तियां कुछ इस तरह से हैं-

भारत के लिए सबसे पहली कोई प्राथमिकता है, तो वह है देश के युवाओं के लिए रोज़गार उपलब्ध कराना.

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पीएम मोदी ने आज से 6 साल पहले युवा, नौकरी और देश की प्राथमिकताएं जैसे शब्द एक साथ बोले थे. यह प्राथमिकताएं हम सभी के लिए है कि अगर युवाओं के साथ नौकरी के नाम पर खिलवाड़ हो तो उसके बारे में चर्चा की जाए. उनकी समस्याओं को सुना जाए और उनकी नाराजगी को समझा जाए.

रोजगार के मामले में देश का यह आलम है कि सालों बाद केंद्र सरकार के विभाग नौकरियां निकालते हैं, उसके बाद एग्जाम कराने में तीन-चार साल लगा देते हैं. इनमें से कई भर्तियां पूरी भी नहीं हो पाती हैं और जब जैसे-तैसे करके एग्जाम कराया जाता है तो पेपर लीक हो जाता है. SSC, रेलवे का तो यही हाल है.

राज्यों में अगर नौकरियों की बात करें. चुनाव के समय ही राज्यों में नौकरियां निकलती है. इसको लेकर चुनाव के प्रचार-प्रसार में खूब ढोल पीटे जाते हैं और जब चुनाव खत्म हो जाता है, तो भर्तियों की फाइलें पहले की तरह धूल खाने लगती हैं. दशकों के बाद भी यह भर्ती प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाती हैं. आज आपको कुछ राज्यों का हाल सुनाते हैं.

सबसे पहले उत्तर प्रदेश की बात करेंगे

पिछले साल सितंबर में सोशल मीडिया पर रोजगार की मांग को लेकर एक अभियान शुरू हुआ था. इस अभियान का केंद्र उत्तर प्रदेश था. ऐसा क्यों? क्योंकि उत्तर प्रदेश में यह कैंपने सोशल मीडिया से निकलकर सड़कों पर आ गया था. शहर के कई इलाकों में बड़े प्रदर्शन हुए.

युवाओं के इस प्रदर्शन का असर यह हुआ कि योगी सरकार को अपना रिपोर्ट कार्ड निकालना पड़ा. जिसमें यूपी सरकार ने बताया कि मार्च-2017 से लेकर अब तक कितने लोगों को नौकरियां मिली हैं. रिपोर्ट कार्ड के मुताबिक योगी सरकार के कार्यकाल में कुल 3 लाख 75 हजार युवाओं को सरकारी नौकरी मिली है.

सरकार ने बकायदा विभागवद अपने रोजगार का रिपोर्ट कार्ड दिखा दिया कि किस विभाग में कितने लोगों की भर्ती हुई है. सरकार ने जैसे ही अपना रिपोर्ट कार्ड जारी किया लोगों ने इसकी साख पर सवाल उठाए. यहां पर युवाओं का सवाल उठाना लाजमी था क्योंकि सरकार ने ये तो बता दिया कि हमने कितने सीटों पर भर्ती की है, लेकिन यह नहीं बताया कि भर्ती कब हुई और किस पद पर हुई.

इसी को लेकर छात्रों ने पूछ लिया कि जब इतनी नौकरियां दे दी गई हैं, तो यह भी बता दें कि कौन सी वैकेंसी में कितने लोगों को भर्ती किया है. अभ्यार्थियों ने आरोप लगाया कि सरकार ने वो वैकेंसियां भी गिन ली हैं जिनकी भर्तियां अभी पूरी नहीं हुई हैं।

यूपी सरकार ने तोड़-मरोड़ कर आंकड़ो को पेश किया, अलग-अलग जानकारी नहीं दी. चलो हम आपको बता देते हैं कि आंकड़ो के साथ कितनी छेड़छाड़ हुई है. सबसे पहले उत्तर-प्रदेश अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (UPSSSC) की बात करते हैं.

सरकार का कहना कि उन्होंने UPSSSC के जरिए 16,708 पदों पर भर्ती की है. लेकिन UPSSSC की तैयारी करने वाले छात्र कुछ और ही कहते हैं. बेरोजगारी के खिलाफ सरकार से लड़ने वाला संगठन युवा हल्ला बोल ने RTI के हवाले से दावा किया है कि बीजेपी सरकार के समय UPSSSC ने 13 पदों पर नौकरियां जारी की थी. जिनमें से एक भी पदों पर नियुक्ति नहीं हुई. सरकार बताए कि UPSSSC जिन 16,708 पदों की बात कर रही है वह कौन सी भर्तियां है? संगठन के अनुसार दिसंबर 2020 में मुख्यमंत्री ने 3,209 नलकूप चालकों को नियुक्ति पत्र दिया था, लेकिन 16,708 पदों के आंकड़े पर सरकार को स्पष्टीकरण देना चाहिए.

पत्रकार राजन चौधरी ने भी एक RTI लगाई. इसमें उन्होंने मार्च 2017 से लेकर 31 दिसंबर 2020 तक उत्तर प्रदेश सरकार अधीन सभी सरकारी और अर्ध सरकारी नियुक्तियों के विभागवार जानकारियां मुख्यमंत्री कार्यालय से मांगी थी. मुख्यमंत्री कार्यलय ने जवाब को RTI कर्मिक विभाग को भेज दिया, उनको जवाब मिला-

कर्मिक विभाग के पास कोई सूचना उपलब्ध नहीं है.

ये हाल उत्तर प्रदेश के एक भर्ती आयोग का है. हमारे पास गिनाने के लिए और भी विभाग के आंकड़े हैं, लेकिन जाने देते हैं, क्योंकि सभी विभाग यही है. कहीं सीटे खाली रह जाती हैं, तो कहीं भर्तियां नहीं पूरी होती है. कहीं पर ट्रेनिंग और तो मेडिकल नहीं आता है, लेकिन सरकारें इन्हें पूरा बता देती हैं.

राज्य के हर सड़क-चौराहे पर इश्तेहार लगाकर प्रचार किया जाता है 3 लाख 75 हजार लोगों को नौकरियां दे दी. मुख्यमंत्री इसका श्रेय लेते हुए खूब प्रचार-प्रसार करते हैं, लेकिन जब इन नौकरियों की जानकारी मांगी जाती है, तो कर्मिक विभाग कहता है हमारे इसकी कोई जानकारी है.

यह नौकरियां कब आती हैं, किसे मिलती हैं, कैसे दे दी गई, इसकी जानकारी तैयारी करने वाले छात्रों को मिलती ही नहीं हैं. सरकारों के जुमलों में बेशुमार नौकरियां हैं, लेकिन छात्र सोशल मीडिया पर थाली पीट-पीटकर गुहार लगा रहा है कि भर्तियां पूरी करो.

यह भी पढ़ें- अगर सरकार का काम बिजनेस करना नहीं है, तो क्या है? समझें विस्तार से

राजस्थान का क्या हाल है

राजस्थान में बेरोजगारों ने गहलोत सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. जयपुर में 14 फरवरी से हजारों की संख्या में अभ्यर्थी अपनी मांगो को लेकर धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं. राज्य में दो दर्जन से अधिक भर्ती परीक्षाएं लंबित हैं ये लोग उनको पूरा करने की मांग कर रहे हैं. छात्रों की मांग है कि नर्सिंग, जीएनएम और एएनएम के हजारों पदों पर भर्ती प्रक्रिया को पूरा किया जाए.

पंचायत पाद एलडीसी 2013 के 10,029 पदों पर और तृतीय श्रेणी शिक्षक भर्ती 2012 को जल्द से निपटाया जाए. क्या आपने इन भर्तियों के साल पर गौर किया, 2012 और 2013 मतलब कि जब भर्तियां निकली थी, तब भी अशोक गहलोत की सरकार थी. इसके बाद जब कार्यकाल पूरा हुआ, तो वसुंधरा राजे की सरकार आई. उन्होंने भी पांच साल का कार्यकाल पूरा किया. गहलोत फिर से मुख्यमंत्री बन गए और आज उनका कार्यकाल आधा हो चुका हो चुका है.

यानी सरकारें बदली अशोक गहलोत फिर से मुख्यमंत्री बन गए और आधा कार्यकाल भी पूरा हो गया, लेकिन भर्तियां वहीं की वहीं अटकी रहीं.

चलो छत्तीसगढ़ को देखते हैं क्या गुल खिलाए हैं..

सोचिए जरा आपने सब्जी बनाने के लिए गैस पर कढ़ाई और आप उसे भूल गए. क्या होगा इससे सब्जी जल जाएगी. ठीक छत्तीसगढ़ की सरकार ने ऐसा ही किया है. वैकेंसी निकाली, फॉर्म भरवाया और इसके बाद सरकार भूल गई. युवाओं की जिंदगी का परिणाम वही हुआ जो सब्जी के साथ हुआ.

अगस्त 2018 में छत्तीसगढ़ पुलिस की तरफ से 655 पदों पर SI सूबेदार, प्लाटून कमांडर की भर्ती के लिए ऑनलाइन आवेदन आया. 24 अक्टूबर 2018 तक आवेदन की प्रक्रिया चली. इसी बीच विधानसभा चुनाव शुरू हो जाते हैं और भर्ती प्रक्रिया पर ब्रेक लग जाता है. 655 पदों की वैकेंसी में आठ तरह के पद थे, सूबेदार. सब-इंस्पेक्टर, सब-इंस्पेक्टर (स्पेशल ब्रांच), प्लाटून कमाण्डर आदि.

हर पोस्ट के लिए अलग-अलग आवेदन लिया गया. एक आवेदन पर 400 रुपए देने थे. यानी जो चारों पोस्ट के लिए अप्लाई करता उसे 1600 रुपए देने होते. लगभग सवा लाख लोगों ने फॉर्म को भरा था. 2018 से 2021 आ गया लेकिन नियुक्ति की छोड़ो एग्जाम की डेट तक नहीं आई.

मध्य प्रदेश चलते हैं शायद कुछ अच्छा हुआ हो

मध्य प्रदेश में शिवराज सरकार ने सितंबर 2018 में शिक्षक पात्रता परीक्षा का आयोजन किया था. अब इससे पहले की परीक्षा के नतीजे आते कि सरकार बदल गई और रिज्लट लटक गया. इसके बाद अभ्यार्थियों ने प्रदर्शन किया तो अगस्त 2019 में रिजल्ट घोषित हुआ. नियुक्ति की प्रक्रिया चलते-चलते जुलाई 2020 आ गया.

जुलाई 2020 में चयनित शिक्षकों का डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन हुआ लेकिन बाद में इसे भी रोक दिया गया.जो अभी तक रुकी हुई है. अब चयनित शिक्षक समय-समय पर भोपाल आते हैं, धरना प्रदर्शन करते हैं जल्द से जल्द नियुक्ति की मांग करते हैं और मिलता क्या है वही आश्वासन. मध्य प्रदेश में पिछले तीन सालों से तीन बार सरकार बदली लेकिन किसी इन लटकी हुई भर्तियों के बारे में नहीं सोचा.

इन मामलों में सरकारों की गलती है. क्योंकि जब सरकारें नौकरियों की घोषणा करती हैं. तो इस वादे को सुनकर छात्र तैयारियों में लग जाते हैं. उनके हिस्से का काम नौकरी का फॉर्म भरना और उसकी तैयारी करना है, लेकिन अब उसे इससे ज्यादा करना पड़ता है. संगठन बनाना पड़ता है. प्रदर्शन करना पड़ता है ताकि सरकारों को याद आए कि उन्हें नौकरियां निकालनी है.

सरकार नौकरी प्रक्रिया में कोई न कोई खामी छोड़ देती है. जिसकी वजह से मामला कोर्ट में फंस जाता है. छात्र जैसे-तैसे चंदा इक्ट्ठा करके वकील करते हैं और कोर्ट में केस लड़ते हैं.

कुछ लोग कहते हैं कि नौकरियां सिर्फ सरकारी नहीं होती हैं, प्राइवेट भी होती हैं. यह बात बिल्कुल ठीक भी है. पर लगातार सरकारी नौकरियां कम हो रही हैं. अब ऐसे में जितनी नौकरियां हैं, कम से कम उन्हीं को ठीक से कराए.

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