Wednesday, August 4, 2021

United Nation में भारत ने क्यों नहीं दिया श्रीलंका का साथ?

वर्ल्ड न्यूज़ डेस्क। श्रीलंका के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार (UNHRC) ने प्रस्ताव पारित किया है. यह प्रस्ताव श्रीलंका में होने वाले मानवाधिकारों के उल्लंघन से संबधित है. लेकिन इसके लिए होने वाली वोटिंग से भारत ने खुद को अलग कर लिया है. आइए जानते हैं विस्तार से पूरा मामला.

भारत के सामने बड़ा धर्मसंकट?

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UNHRC में पारित इस प्रस्ताव का शीर्षक श्रीलंका में सुलह, जवाबदेही और मानवाधिकारों को बढ़ावा देना था. इस प्रस्ताव के पक्ष में कुल 47 देशों ने वोट दिया है. साथ ही 11 देशों ने इसके विरोध में वोट दिया है. वहीं, 14 देशों ने वोटिंग से किनारा कर लिया है. इस तरह से यह प्रस्ताव पास हो गया.

इस प्रस्ताव में श्रीलंका की सेना के द्वारा किए जा रहे मानवाधिकार का उल्लघंन और तमिल लोगों पर हो रहे अत्याचार का जिक्र था. ऐसे में भारत धर्मसंकट फंस गया कि वोट करे या नहीं. क्योंकि एक तरफ श्रीलंका भारत का पड़ोसी है और उसके खिलाफ वोट डालना कठिन है. खासकर तब जब चीन और पाकिस्तान श्रीलंका से नजदीकियां बढ़ा रहे हैं. श्रीलंका के राष्ट्रपति राजपक्षे को चीन कुछ ज्यादा ही पसंद है.

वहीं, दूसरी ओर भारत का तमिल अल्पसंख्यक के साथ न खड़ा होना भी ठीक नहीं है. क्योंकि, तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. ऐसे में भारत के सामने एक तरफ कुंआ और दूसरी तरफ खाई वाली स्थिति पैदा हो गई है. इन्हीं कारणों के चलते भारत ने खुद को वोट डालने से किनारे कर लिया.

श्रीलंका ने मांगी भारत से मदद

इस प्रस्ताव से श्रीलंका की इज्जत पर आ बनी थी, इसलिए वह कोई कसर नहीं छोड़ना चाहता था. श्रीलंका को भारत का भी साथ चाहिए था. इसलिए श्रीलंका के राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे ने प्रधानमंत्री मोदी को फोन किया. लेकिन भारत की भी कुछ मजबूरियां थी, इसलिए वोट न करने का फैसला लिया. वैसे आपको बता दें, भारत और मानवाधिकार काउंसिल की बनती नहीं है. कई मुद्दों पर भारत और मानवाधिकार काउंसिल आमने सामने आ चुके हैं, चाहे वो आर्टिकल 370 का मामला हो या फिर कृषि कानून का.

चीन और पाकिस्तान आए श्रीलंका के समर्थन में

चीन की हमेशा से मौके पर चौका मारने की आदत रही है. चीन इस मौके का फायदा उठाकर श्रीलंका को अपने पाले में करने के लिए तुरंत उसके पक्ष में वोट डाल दिया. चीन की हां में हां मिलाने वाले पाकिस्तान ने भी श्रीलंका के पक्ष में वोट डाल दिया. इसके बदले में श्रीलंका ने पाकिस्तान को आश्वासन दिया कि वह बुर्के पर बैन नहीं लगाएगा. बता दें, चीन और पाकिस्तान के अलावा बांग्लादेश, वेनेजुएला, रूस, क्यूबा आदि देशों ने श्रीलंका के पक्ष में वोट डाला है.

विधानसभा चुनावों पर पड़ेगा इसका असर?

जिनेवा में इस प्रस्ताव को लेकर गहमागहमी चल रही थी. लेकिन इसका असर तमिलनाडु के विधानसभा चुनाव में दिख रहा है. इसलिए बीजेपी सरकार कोई रिस्क नहीं लेना चाहती थी. इस प्रस्ताव को लेकर बीजेपी सरकार पर कई राजनीतिक पार्टियों का दबाव था. डीएमके के नेता एम के स्टालिन और अन्य नेताओं ने भारत सरकार से इसका समर्थन करने की मांग की थी.

श्रीलंका के विदेशमंत्री ने एक बयान दिया था जिसमें कहा था कि भारत श्रीलंका के पक्ष में वोट देगा. एम स्टालिन ने इस बयान की आलोचना की और कहा, तमिल लोग इस प्रस्ताव पर सरकार का रुख जानने के लिए काफी व्याकुल हैं लेकिन बीजेपी सरकार ने श्रीलंका के विदेश मंत्री को भारत का पक्ष रखने की अनुमति दे दी है. जो बेहद दुखद है. अगर तमिल लोगों के हितों के साथ धोखा होगा तो दुनिया में रह रहे 9 करोड़ तमिल लोग उन्हें कभी माफ नहीं करेंगे.

वहीं कांग्रेस नेता पी चिदंबरम ने ट्वीट कर कहा कि भारत को प्रस्ताव के पक्ष में वोट करना चाहिए और श्रीलंका के द्वारा किए गए मानवाधिकारों के उल्लंघन का आव्हान करना चाहिए. भारत को तमिल और अन्य समुदाय के लोगों के साथ खड़ा होना चाहिए जिन्हें मानवाधिकार से वंचित रखा गया है.

दशकों पुराना है विवाद

श्रीलंका में सिंहली और तमिल लोगों के बीच का तनाव दशकों पुराना है. इसकी शुरुआत 1940 के दशक से हुई थी. साल 1950 के आते आते वहां तमिलों पर अत्याचार बढ़ गया. जिससे यह मामला खींचता गया. साल 1976 में लिबरेशन टाइगर तमिल ईलम (LTTE) की स्थापना हुई जिसे लिट्टे कहा जाता था.

इस संगठन का उद्देश्य तमिल लोगों के अधिकारों के लिए लड़ना था. सन् 1983 में LTTE और श्रीलंकाई गवर्नमेंट के बीच युद्ध शुरू हो गया. जो काफी लंबे समय तक चला. श्रीलंका की सरकार ने 2008 में LTTE के खिलाफ आल आउट युद्ध की शुरु किया. फिर इसके बाद साल 2009 में श्रीलंकाई सरकार ने बताया कि LTTE हार चुकी है.

संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक इस युद्ध में करीब 40,000 आम नागरिकों की मौत हुई है. इसी को लेकर 2012 में UNHRC ने श्रीलंका के खिलाफ एक प्रस्ताव पारित किया था. जिसका भारत ने भी समर्थन किया था. UNHRC में इससे सम्बन्धित कई प्रस्ताव लाए जा चुके हैं. श्रीलंका के खिलाफ पिछले 12 सालों में 7 प्रस्ताव पारित किए जा चुके हैं. तमिलनाडु के नेता हमेशा से श्रीलंका की सरकार से मांग कर रहे हैं कि वे श्रीलंकाई संविधान के 13वे संशोधन के अनुसार तमिल लोगों को अधिकार दे.

क्या है 13वां संविधान संशोधन?

श्रीलंकाई संविधान में 13वां संशोधन 1987-90 के बीच भारत के श्रीलंका में हस्तक्षेप का परिणाम है. 1978 का यह संविधान संशोधन श्रीलंका को Unitary देश बनता है. इस संशोधन से तहत संविधान में कई बड़े बदलाव किए गए थे. इसके मुताबिक श्रीलंका की सरकार ज्यादा तमिल आबादी वाले उत्तर-पूर्व प्रांत को राजनीतिक शक्तियां देगी और उन्हें प्रोविंशियल काउंसिल बनाने का अधिकार दिया जाएगा. इस 13वें संशोधन ने न केवल उत्तर-पूर्व प्रांत को बल्कि सभी प्रांतों को प्रोविंशियल काउंसिल बनाने का अधिकार दे दिया. बता दें, यह संविधान संशोधन भारत के हस्तक्षेप के बाद आया है इसलिए वहां के राष्ट्रवादी लोग इस संशोधन को ख़त्म करने की बात करते रहे हैं.

 

यह भी पढ़ें- बांग्लादेश में पीएम मोदी के खिलाफ लगे ‘गो बैक किलर मोदी’ के नारे

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