Tuesday, August 3, 2021

एक ऐसे नेता जो अटल के बेहद करीब थे, पर RSS को थी उनसे खुन्नस

राजनीतिक इतिहास में एक ऐसे नेता जिनकी जड़ें कांग्रेसी थी, लेकिन आगे चलकर जब कांग्रेस ही कांग्रेस न रही तो वह अटल बिहारी वाजपेयी के घनिष्ट मित्र बन गए. दोनों की दोस्ती इतनी पक्की कि जब वह दूसरे बीजेपी नेता की तरह जय श्री राम के नारे लगा रहे थे, उन्हें खुद वाजपेयी ने रोक दिया था.

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फिर एक ऐसा दौर आया, जब कैबिनेट में वाजपेयी ने खुद के बाद नंबर 2 पर उन्हें मंत्री के तौर पर शपथ दिलाई और फिर जब जीवन का अंतिम चरण आया तो विवाद हो गया कि उन्हें जलाया जाए या फिर दफानाया.

हां, हम बात कर रहे हैं सिकंदर बख्त की. यह वही सिकंदर बख्त हैं, जिन्हें भारतीय जनता पार्टी का पहला बड़ा मुस्लिम चेहरा माना जाता था. ये इतने बड़े चेहरे थे कि 90 के दशक में संसद में वह बीजेपी के 2 फ्लोर नेता में से एक हुआ करते थे. उस समय बीजेपी के फ्लोर लीडर अटल बिहारी वाजपेयी हुआ करते थे, जबकि राज्यसभा में यह जिम्मेदारी सिकंदर बख्त पर थी.

सिकंदर बख्त खांटी दिल्ली के रहने वाले थे. उनका जन्म, पढ़ाई-लिखाई, ब्रिटिश काल में सप्लाई डिपार्टमेंट में पहली नौकरी सब दिल्ली में ही था. इसके बाद में कांग्रेस ज्वाइन किया और म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन की नेतागिरी करने लगे.

उन्होंने 1952 में MCD का चुनाव भी जीता. अगले दो दशक तक MCD में कांग्रेस का झंडा फहराते रहे, वो भी उस समय जब रिफ्यूजियों की पार्टी कही जाने वाली जनसंघ रिफ्यूजी बस्तियों से निकलकर पूरे MCD में अपना कब्जा कर रही थी. लेकिन तभी सिकंदर खांटी कांग्रेसी बने रहे. हालांकि बाद में उन्होंने कांग्रेस को छोड़कर जनसंघ के साथ हाथ मिला लिया था. लेकिन इसमें अभी वक्त था. आगे बताते हैं कैसे क्या हुआ?

first bjp muslim leader

जब कांग्रेस में हुई महाटूट

40 के दशक में सिकंदर बख्त सप्लाई डिपार्टमेंट की नौकरी छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुए थे. लेकिन उस समय कांग्रेस सभी विचारधारओं का एक अंब्रेला ऑर्गनाइजेशन हुआ करता था. जहां पर सबकी सुनी जाती थी. एक किस्सा बताता हूं, जिससे आपको पता चलेगा कि कांग्रेस के अंदर कितनी डेमोक्रेसी थी.

यह बात 50 के दशक की है. उस वक्त कैबिनेट में खूब बहस हुआ  करती था. कई बार प्रधानमंत्री नेहरू की खूब आलोचना होती थी. नेहरू सब सुनते थे और कई बार इससे परेशान होकर इस्तीफे की पेशकश कर देते थे. उनकी इस पेशकश से मामले निपट जाते थे.

ऐसे ही एक बार नेहरू ने नाराज होकर अपने इस्तीफे की पेशकश कर दी. उन्होंने कैबिनेट में कहा, अगर मुझसे इतनी दिक्कत है, तो मैं अपना इस्तीफा दे देता हूं. इस पर संचार मंत्री रफी अहमद किदवई को रहा नहीं गया और उन्होंने तुरंत कहा, हां, हां आप इस्तीफा दे दीजिए. मैं सब कुछ संभाल लूंगा. ऐसा संभालूंगा कि 6 महीने के बाद आपको कोई याद नहीं करेगा. इस घटना के बाद से नेहरू ने अपने इस्तीफे की घमकी देना हमेशा के लिए बंद कर दिया. 

इस घटना से पता चलता है कि उस दशक में राजनीतिक दलों में अपनी बात रखने की कितनी आजादी थी और इसका कोई बुरा भी नहीं मानता था. सिंकदर बख्त ने इसी दशक में और इसी माहौल में कांग्रेस को ज्वाइन किया था. लेकिन साल 1969 के आते-आते सब कुछ बदल गया.

इस वक्त इंदिरा गांधी का नया दौर आ गया और इस समय राजनीतिक दलों को प्राइवेट कंपनियों की तरह चलाने का ट्रेंड चालू हो गया. इस दौर में उस परंपरा ने जन्म लिया जिसमें आलाकमान से अलग राय रखने पर उसे पार्टी से बाहर कर दिया जाता था.

सन् 1969 में कांग्रेस के अंदर एक लड़ाई शुरू हो गई और इस लड़ाई का परिणाम कांग्रेस महाविभाजन निकला. इस महाविभाजन में सिकंदर इंदिरा की तरफ चले गए. उस समय इस खेमे को संगठन कांग्रेस कहा गया.

कैसे बने कैबिनेट मंत्री

सभी को पता है कि 70 के दशक में गुजरात का छात्र आंदोलन, जॉर्ज फ़र्नान्डिज के नेतृत्व वाली रेल हड़ताल और अंत में इलाहाबाद कोर्ट का रायबरेली से इंदिरा गांधी की सांसदी रद्द करना. इन सब ने मिलकर एक ऐसी राजनीतिक खिचड़ी बनाई कि सत्ता को बचाने के लिए इंदिरा गांधी ने देश पर इमरजेंसी थोप दी.

इमरजेंसी के दौरान कई विपक्षी नेताओं और छात्रों को जेल भेज दिया गया और इन सब के जेल जाने के बाद शुरू हुआ संजय गांधी का जबर्दस्ती की नसबंदी का खेल. इस खेल का सबसे वीभत्स रूप दिल्ली में सामने आया, तुर्क गेट और पुरानी दिल्ली के इलाकों में, जहां पर प्रशासन लोगों का जबर्दस्ती नसबंदी करने और अपना टार्गेट अचीव करने के लिए मार-पीट के लिए उतारू थे.

19 महीने के बाद जब यह सब शांत हुआ और इमरजेंसी खत्म हुई, तो देश में चुनाव कराए गए. इस चुनाव में इंदिरा का सामना करने के लिए सोशलिस्ट, जनसंघ, स्वतंत्र पार्टी और संगठन कांग्रेस ने मिलकर जनता दल पार्टी बनाई और कैंडिडेट खोजने लगे. सबसे ज्यादा माथापच्ची दिल्ली के चांदनी चौक सीट के कैंडिडेट के लिए हुई, क्योंकि इस इलाके में संजय गांधी के विवादास्पद कार्यक्रम की खूब जोर-जबर्दस्ती हुई थी.

आखिर में सिकंदर बख्त का नाम फाइनल हुआ. उनके प्रचार में पड़ोस की नई दिल्ली की सीट से चुनाव लड़ रहे अटल बिहारी वाजपेयी पहुंचे. वाजपेयी ने सबको भरोसा दिलाते हुए कहा कि

यदि हम लोग सरकार में आते हैं, तो मेरा भरोसा रखिए. किसी को भी जबर्दस्ती नसबंदी कराने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा.

लोगों ने वाजपेयी का भरोसा कर लिया और सिकंदर बख्त को लोकसभा में भेज दिया. लोकसभा में पहुंचने के बाद मोरारजी देसाई ने उन्हें अपनी कैबिनेट में शामिल कर लिया और उन्हें हाऊसिंग सप्लाई और रिहैबिलिटेशन मंत्री बनाया.

यह मंत्रालय उन्हें अपने संसदीय क्षेत्र की जिम्मेदारी के हिसाब से अच्छा लगा, क्योंकि इमरजेंसी के दौरान दिल्ली को सुंदर बनाने के नाम पर इस इलाके के तुर्कमान गेट में सबसे ज्यादा तोड़-फोड़ कर हजारों लोगों को बेघर कर दिया गया था. मंत्री पद रहते हुए सिकंदर बख्त ने सबका पुर्नवास किया. लेकिन तीन साल के बाद उनको खुद अपने राजनीतिक पुनर्वास की नौबत आ गई. क्योंकि जनता पार्टी बिखर चुकी थी.

sikandar bakht story

कैसे बीजेपी में शामिल हुए

जनता पार्टी और सरकार के बिखरने के बाद जनसंघ के नेताओं के बीच हिंदुत्व की राजनीति को लेकर रेस शुरू हो गई. इसी के चलते 6 अप्रैल 1980 को जनता पार्टी का एक बार फिर से बटवारा हुआ. जनसंघ के लोगों ने भारतीय जनता पार्टी के नाम से अलग पार्टी बना ली.

इसके अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी बने थे. लेकिन वाजपेयी ने नई पार्टी की स्थापना बैठक में हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तान के नारे की जगह गांधीवादी समाजवाद का नारा लगाया. इसका फायदा यह हुआ कि कांग्रेस मिजाज वाले सिकंदर बख्त वाजपेयी के साथ नजर आने लगे.

इसके बाद उन्हें पार्टी का जनरल सेक्रेटी बना दिया गया. 84 आते-आते बख्त पार्टी के उपाध्यक्ष बन गए. पर 80 के दशक के अंत में बीजेपी में आडवाणी का दौर आ गया और 2 लोकसभा सीटों वाली पार्टी 86 तक पहुंच गई. सिकंदर बख्त को 1990 में मध्यप्रदेश से राज्यसभा भेज दिया गया. इस समय अटल बिहारी वाजपेयी बीजेपी के फ्लोर लीडर थे और बख्त उनके डिप्टी थे. मतलब 13 साल पहले मोरारजी के कैबिनेट में शुरु हुआ दोनों का साथ राज्यसभा तक बना रहा. दोनों परस्पर विश्र्वास और भरोसे के प्रतीक बन चुके थे इसलिए आगे भी दोनों का साथ बरकरार रहना था. पर 1992 में सिकंदर बख्त राज्यसभा में विपक्षी नेता बन गए.

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बख्त से RSS को खुन्नस

सिकंदर बख्त भले ही बीजेपी का हिस्सा रहे हों, लेकिन ऐसा माना जाता है कि संघ परिवार बख्त के साथ कम्फर्टेबल नहीं था. इस बात का सबूत संघ के मुखपत्र कहे जाने ऑर्गनाइजर में मिलता है. जून 1952 के इस पत्रिका के एक अंक में सिकंदर बख्त के बारे में काफी आपत्तिजनक बातें लिखी गई थी. इसमे लिखा गया था –

सिकंदर बख्त एक वेश्या का बेटा है. वह पहले मुस्लिम लीग का हिस्सा था और जब 1947 में विभाजन के दौरान हिंसा हुई, तब कांग्रेस ने उस हिंसा को रोकने के लिए सिकंदर बख्त को पार्टी में शामिल किया. उस वक्त उसकी दोस्ती कांग्रेस नेत्री सुभद्रा जोशी से हो गई. इसके बाद दोनों साथ-साथ रहने लगे. इस दौरान बख्त ने सुभद्रा जोशी की मदद से रिफ्यूजियों की प्रॉपर्टी भी हथियाई.

अटल ने बख्त को नारे लगाने से रोका

80 के दशक के आखिरी दौर और 90 के दशक की शुरुआती दौर में बीजेपी के लिए राम मंदिर आंदोलन का दौर था. इस दौर में जय श्रीराम का नारा बीजेपी का मुख्य नारा था. एक दिन अटल बिहारी वाजपेयी की सभा में जय श्री राम के नारे लगने लगे. तो पार्टी वर्कर्स को देखकर सिकंदर बख्त भी जय श्री राम का नारा लगाने लगे. उन्हें नारा लगाता देख वाजपेयी ने टोकते हुए कहा कि

आप जय श्री राम का नारा क्यों लगा रहे हैं? आप इन सब में न पड़िए और अल्लाह की इबादत कीजिए. भगवान और अल्लाह में कोई फर्क नहीं है.

atal and sikandar

मंत्रालय के लिए नाराज हुए बख्त

साल 1996 में लोकसभा चुनाव हो चुके थे. इस चुनाव में पहली बार भारतीय जनता पार्टी 161 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी, लेकिन बहुमत के आंकड़े से दूर थी. इसके बावजूद राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने बीजेपी नेता अटल बिहारी वाजपेयी को सरकार बनाने का निमंत्रण दिया.

इस दौर में बीजेपी को लेकर अल्पसंख्यक समुदायों में एक संशय हुआ करता था. लोगों को लगता था, कि अगर बीजेपी की सरकार आई तो ये क्या करेंगे. लेकिन वाजपेयी ने संशय को अपने शपथ समारोह में विराम लगा दिया.

वाजपेयी ने 16 मई 1996 में जब प्रधानमंत्री की शपथ ली, तो लोगों को काफी आश्चर्य हुआ कि मुरली मनोहर जोशी औऱ जसवंत सिन्हा जैसे नेताओं के होते हुए, वाजपेयी के ठीक बाद सिकंदर बख्त को शपथ दिला दी गई. उस वक्त बीजेपी के इस कदम से समाज में मैसेज गया कि पार्टी सभी समुदाय के लोगों को एक साथ लेकर चलना चाहती है.

सरकार में नबंर 2 के मंत्री होने के बावजूद को सिकंदर बख्त को कोई बड़ा मंत्रालय नहीं दिया गया. उनको शहरी विकास मंत्री बनाया गया. इससे वे बेहद नाराज हो गए. बख्त को लगता था कि वे काफी सीनियर हैं. इसलिए उनको रायसीना हिल पर ऑफिस वाले टॉप 4 मिनिस्ट्री गृह, वित्त, रक्षा या वित्त में से कोई एक दिया जाएगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

इसके बाद जब वाजपेयी को अपने दोस्त बख्त की नाराजगी का पता चला, तुरंत उन्हें साउथ ब्लॉक के रूम नंबर 171 में बैठा दिया. वाजपेयी खुद ड़ेढ दशक पहले विदेश मंत्री के तौर पर इस ऑफिस में बैठ चुके थे. अब इसकी जिम्मेदारी सिकंदर बख्त पर थी. पर वह अपनी कुर्सी का ढंग का इस्तेमाल नहीं कर सके, क्योंकि 13 दिनों में बहुमत न होने के कारण अटल की सरकार गिर गई.

लेकिन 2 साल बाद जब अटल की सरकार दोबारा बनी, उन्हें फिर से मंत्री बनने का मौका मिला. इस बार उन्हें उद्योग मंत्रालय मिला था, लेकिन फिर से अटल की सरकार 13 के चक्कर में पड़ गई. असल में 13 महीने के बाद 269 और 270 के चक्कर में उनकी सरकार एक वोट से गिर गई. लेकिन मध्यावधि चुनाव में एक बार फिर वाजपेयी की सरकार वापस आई, लेकिन सिकंदर बख्त को इस बार मंत्री नहीं बनाया गया. माना जाता है कि RSS के दबाव में आकर उन्हें मंत्री नहीं बनाया गया. पर वाजपेयी ने अपने दोस्त सिकंदर को बहुत कुछ दिया. उन्हें पद्म विभूषण से नवाजा गया. इसके साथ कुछ दिनों के बाद उन्हें केरल राज्य से राज्यसभा भेज दिया, जहां पर वे अपने आखिरी दिनों तक रहे.

23 फरवरी 2004 को सिकंदर बख्त का निधन हो गया. उस समय वह राज्यपाल का पद संभाल रहे थे. उनके निधन के बाद बहस होने लगी कि उनका अंतिम संस्कार मुस्लिम रीति-रिवाज के साथ किया जाए या फिर हिंदू रीति-रिवाज के. इसको लेकर बहस छिड़ी हुई थी. इसके पीछे भी कारण था, क्योंकि उन्होंने राज शर्मा नाम की हिंदू लड़की से शादी की थी. इस शादी से उनके 2 बेटे हुए- अनिल बख्त और सुनील बख्त. बताया जाता है कि दोनों हिंदू रीति-रिवाजों में विश्वास रखते हैं. इसलिए इस प्रकार की अटकलों को बल मिला, लेकिन बाद में उन्हें मुस्लिम परंपरा के मुताबिक दिल्ली में सुदुर्प ए खाक किया गया.

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