Saturday, October 16, 2021

ऐसे दिलेर मराठा शासक की कहानी, जिसने औरंगजेब को नाको चने चबवा दिए

न्यूज डेस्क। मराठा साम्राज्य की नींव रखने वाले छत्रपति शिवाजी महाराज के सबसे बड़े पुत्र संभाजी राजे थे. औरंगजेब ने उनकी महज 32 साल में हत्या करवा दी थी. बताया जाता है कि बहुत ही कम उम्र में उन्हें राजनीति की गहरी समझ थी.

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संभाजी राजे का जन्म 14 मई 1657 में पुरंदर किले में हुआ था. इनकी माता का नाम सईबाई था. सईबाई शिवाजी महाराज की पहली और सबसे प्रिय पत्नी थी. जब वह दो साल के थे तो इनकी मां का देहांत हो गया था. जिसकी वजह से उनकी परवरिश दादी जिजाबाई ने की.

संभाजी नौ साल की उम्र में एक समझौते के तहत राजपूत राजा जयसिंह के यहां बंदी बनकर रहे थे. जब शिवाजी महाराज औरंगजेब को चकमा देकर आगरा से भागे थे तो संभाजी उनके साथ थे. शिवाजी महाराज भांप गए थे कि उनकी जान को खतरा है. इसलिए उन्हें अपने रिश्तेदार के यहां छोड़कर चले गए थे और उनके मरने की खबर फैला दी थी. कुछ दिनों के बाद वह महाराष्ट्र पहुंचे.

purandar kila

रिबेल टाइप के थे

संभाजी का रवैया बगावती टाइप का था. जिसकी वजह से उन्हें गैर-जिम्मेदार माना जाता था. एक बार शिवाजी महाराज ने उनके आचारण को काबू में करने के लिए 1678 में उन्हें पन्हाला किले में कैद कर दिया था. लेकिन वहां से वह अपनी पत्नी के साथ भाग निकले और मुगलों के साथ मिल गए.

संभाजी लगभग एक साल तक मुगलों के साथ रहे. पर एक दिन उनको पता चला कि मुगल सरदार दिलेर खान उनको बंदी बनाकर दिल्ली भेजने की योजना बना रहा है. तो उन्होंने मुगलों का साथ छोड़ दिया और महाराष्ट्र वापस चले आए. वापस आने के बाद उनकी किस्मत नहीं बदली और उन्हें फिर से बंदी बनाकर पन्हाला भेज दिया गया.

घात-प्रतिघात के बाद बने राजा

अप्रैल 1680 में जब शिवाजी महाराज की मौत हो गई. उस वक्त भी संभाजी जेल में कैद थे. इसके बाद शिवाजी महाराज के दूसरे बेटे राजाराम को सिंहासन पर बैठाया गया. इस बात का पता चलते ही संभाजी ने जेल से निकलने की योजना बनाई. अपने कुछ साथियों की मदद से उन्होंने पन्हाला के किलेदार को मार दिया और किले पर कब्जा कर लिया.

इसके बाद 18 जून 1680 में रायगढ़ के किले पर कब्जा कर लिया. उन्होंने राजाराम, उनकी पत्नी जानकी और मां सोयराबाई को गिरफ्तार कर लिया. 10 जुलाई 1680 में संभाजी का राजतिलक हुआ. कहा जाता है कि अक्टूबर 1690 में संभाजी की सौतेली मां सोयराबाई को फांसी की सजा दी गई थी. उनके ऊपर षड़यंत्र रचने का आरोप था.

मुगलों से युद्ध

गद्दी पर बैठने के बाद संभाजी ने मुगलों से लोहा लेना शुरु कर दिया. उन्होंने बुरहानपुर शहर पर हमला किया और उसे तहस-नहस कर दिया. शहर की सुरक्षा के लिए तैनात मुगल सेनाओं की धज्जियां उड़ा दी. शहर को आग में झोंक दिया. इसके बाद से मुगल और उनके बीच खुले तौर पर दुश्मनी हो गई.

औरंगजेब संभाजी से बहुत चिढ़ते थे. इससे जुड़ा एक किस्सा भी है. एक बार औरंगजेब के चौथे बेटे अकबर ने अपने पिता से बगावत की. तो संभाजी राजे ने उन्हें आसरा दिया था. इस दौरान संभाजी राजे ने अकबर की बहन जीनत को एक पत्र लिखा था. वह पत्र औरंगजेब के लोगों के हाथ लग गया. उस पत्र को भरे दरबार में औरंगजेब के सामने पढ़ा गया. उस पत्र में कुछ इस तरह का लिखा था,

“बदशाह सलामत सिर्फ मुस्लिमों के राजा नहीं हैं. बल्कि हिंदुस्तान के अलग-अलग संप्रदाय के लोग हैं. वे उन सबके राजा हैं. वो जो सोचकर दक्कन आए थे, वो मकसद पूरा हो चुका है. इसी से संतुष्ट होकर अब उन्हें दिल्ली लौट जाना चाहिए. एक बार हम और मेरे पिता उनके कब्जे से छूटकर दिखा चुके हैं. लेकिन अगर वह अपनी जिद पर अड़े रहे तो वे हमारे कब्जे से छूटकर दिल्ली नहीं जा पाएंगे. अगर उनकी मर्जी यही है तो उन्हें दक्कन में अपनी कब्र ढूंढ लेनी चाहिए.”

अपनों ने पीठ पर खंजर मारा

1687 को मुगलों और मराठों के बीच भंयानक लड़ाई हुई. इस लड़ाई में मराठों की जीत हुई, लेकिन इस लड़ाई से उनकी सेना कमजोर हो गई थी. इतना ही नहीं संभाजी के सबसे विश्वासपात्र सेनापति हंबीरराव मोहिते की मौत हो गई. जिसके बाद संभाजी के खिलाफ षड़यंत्र होने शुरु हो गए. उनकी जासूसी की जाने लगी. इसमें उनके रिश्तेदार शिर्के परिवार की अहम भूमिका रही.

जब संभाजी फरवरी 1689 में बैठक के लिए संगमेश्वर पहुंचे, तो घात लगाकर उनपर हमला किया गया. मुगल सरदार मुकर्रब खान की अगुवाई में संभाजी के सभी सरदारों को मार दिया गया. उन्हें और उनके सलाहकार को बंदी बनाकर बहादुरगढ़ ले जाया गया.

बंदी बनाए जाने के बाद औरंगजेब ने संभाजी के सामने एक प्रस्ताव रखा. औरंगजेब ने उन्हें सारे किले सौंपकर इस्लाम कबूल करने को कहा. इसे मान लेने पर उनकी जान को बख्श दिया जाएगा. संभाजी राजे ने औरंगजेब के इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया था. इसके बाद उन्हें खूब टॉर्चर और बेइज्जत किया गया.

हत्या से पहले खूब प्रताड़ित किया गया

बताया जाता है कि इस्लाम न कबूल करने की वजह से संभाजी और उनके सलाहकार को जोकरों वाली ड्रेस पहनाकर पूरे शहर में घुमाया जाता था. पूरे रास्ते में उनके ऊपर पत्थर फेंके जाते थे और उनको भाले चुभाए जाते थे. इसके बाद फिर से उनसे इस्लाम कबूलने को कहा गया. लेकिन उन्होंने इंकार कर दिया.

दोबारा मना करने पर औरंगजेब ने उनको और यातनाएं दी. दोनों की जुबान कटवा दी और आंखे निकाल ली. इसके बारे में यूरोपियन इतिहासकार डेनिस किनकैड़ लिखते हैं,

बादशाह ने उन्हें इस्लाम कबूल करने को कहा. इंकार करने पर उन्हें बुरी तरह से मारा. दोबारा पूछने पर संभाजी ने फिर से इंकार कर दिया. इस बार औंरगजेब ने उनकी जुबान काट दी. एक बार उनसे फिर पूछा गया. तो संभाजी ने लिखने वाली सामग्री मंगवाकर लिखा, अगर बादशाह अपनी बेटी भी दे दें तो भी मैं इस्लाम कबूल नहीं करूंगा. इसके बाद उनको तड़पा-तड़पाकर मार डाला गया.

11 मार्च 1689 में उनके शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर हत्या कर दी गई. कहा जाता है कि औरंगजेब ने संभीजी को मारने से पहले कहा था कि अगर मेरे चारो बेटों में से कोई भी तुम्हारे जैसा होता तो सारा हिंदुस्तान कब का मुगल सल्तनत में समा चुका होता.

कुछ लोगों का मनना है कि उनके शरीर के टुकड़ों को नदी में फेक दिया गया था.जिसके बाद लोगों ने उनके शरीर को वहां से निकाला और उसे सिलकर उनका अंतिम संस्कार किया. वहीं, कुछ लोग मानते हैं कि औरंगजेब ने उनके शरीर के टुकड़े कर कुत्तों को खिला दिया था.

औरंगजेब की उम्मीद पर पानी फिर गया

संभाजी राजे की मौत के बाद मुगल बादशाह औरंगजेब को लगा कि अब मराठा साम्राज्य खत्म हो जाएगा और उस पर काबू पाना आसान हो जाएगा. लेकिन उनकी उम्मदों पर पानी फिर गया. संभाजी के जीते जी जो मराठा कभी एक नहीं हुए. वे उनके मरने के बाद हो गए. जिसकी वजह से औरंगजेब का दक्कन पर राज करने का सपना अधूरा रह गया और संभाजी ने जैसा कहा था वैसे ही औरंगजेब को दक्कन में ही दफन होना पड़ा.

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